• गर तुम्हारी चाहत मे

    Today I would like to reproduce one of my poems I wrote back in 2014. This poem often reminds me to take the challenges of the life head on and enjoy it. Whenever, I feel down, this is one of the poems that I go to for my energy refill. I love reading it. I hope you too will. So here it is…

    गर तुम्हारी चाहत मे

    कोई मुश्किल नही, परेशानी नही है।

    जवानी तो है, पर जवानी नही है।।

    ज़िंदगी जैसे मिली

    उसे वैसे ही स्वीकार किया।

    खुद से ज्याद तुमने

    अपनी किस्मत पर एतबार किया।

    दुनिया को सुनाने को तेरी कोई रोमांचक कहानी नही है।

    जवानी तो है, पर जवानी नही है।

    कुछ नियम तुमने तोड़ा नही

    कुछ नया तुमने जोड़ा नही

    अंजाने के डर से तुमने

    सुरक्षा घेरे को छोड़ा नही।

    गर तुम्हारी आँखों मे

    एक सपनों की दुनिया सुहानी नही है।

    जवानी तो है पर जवानी नही है।।

    उम्र तुम्हारी हुई नही और

    बुड्ढों सी बाते करते हो

    दूसरो के अनुभवो को सत्य मानकर

    कुछ खुद करने से डरते हो॥

    और तुम्हारी हरकतों मे

    कुछ बच्चो जैसी नादानी नही है।

    जवानी तो है, पर जवानी नही है।।

    – सतीश ‘कौतूहल ‘

  • वो आखिरी दिन जब .

    वो आखिरी दिन जब तुम मिले थे

    तुम्हें शायद याद भी ना होगा

    क्यूकी तुम जानते भी नहीं थे

    कि वो आखिरी बार मिल रहे हो तुम।

    अपने मुहब्बत से, अपनी चाहत से

    जो हो गया था तुमसे गुमसुम।

    कोशिश भी तो नहीं कि ना तुमने

    जानने की वजह जो मैं हट सा गया था,

    कट सा गया था। तुमसे या अपने वजूद से।

    ये जो आखिर में अपने रिश्ते के

    कुछ बाते मुझे समझ में आई

    जो आनी नहीं थी।

    मैं प्रौढ़ हो गया था समाज, संस्कार की बातों में;

    अंत में मेरे अंदर बची जवानी नहीं थी।

    तुम मेरे जाती कि नहीं हो

    मेरे समाज कि नहीं हो

    इसका आगे दुष्परिणाम होगा।

    ये छोटी सोच मुझसे जीत गयी कि

    मैं तुम्हें अपना बनालू सदा के लिए तो

    मेरा नाम बदनाम होगा।

    कितना मतलबी हो गया था

    जो खुद के झूठे अहम के आगे

    खुद के दिल कि सुना नहीं।

    जब लड़ाई थी खुशियों की और परम्पराओं कि

    तो मैंने खुशियों को चुना नहीं।

    आज एक एक पल याद आता है

    तेरी साथ बिताए पल का।

    अफसोस होता है मुझे

    उस बीते हुये कल का

    जिसमे  मैंने तुम्हें ठुकराया था।

    जो तुम्हें खोकर

    मुझे आजतक भी समझ नहीं आया

    मैंने क्या पाया था।

    कई बातें कहना चाहता हूँ

    पर आखिरी बात सुनाता हूँ।

    तुझे शायद यकीन होगा

    तेरे अंदर एक नाराजगी होगी

    कि मैं खुश होऊंगा तुझे छोड़ कर

    तुझसे दूर जाकर

    और अब मैं शायद तुम्हें याद भी

    नहीं कर पता हूँ।

    पर मैं बता दूँ

    तू मोहब्बत थी मेरी

    ज़िंदगी बन गयी है।

    पर तेरे बिना एक पल भी

     जो तुम्हें छोडकर जीता हूँ

    जीता तो हूँ

    पर मैं जानता हूँ

    जी नहीं पाता हूँ।

    वो जो आखिरी बार मिले थे तुम

    आखिरी मुलाक़ात है हमारी।

    कि फिए तुम कभी मिल नहीं पाओगे

    इसका  बिल्कुल भी हमे आभास नहीं था।

    मैं तो बावला था पर

    वो बताना भूल गए थे ना तुम

    कि मैं दूर हो रहा हूँ।

    अब तुम्हारे पास नहीं था।

    क्या दुबारा तुम्हारे साथ

    जीना का मौका मुझे  ज़िंदगी देगी

    या मैं तुम्हारे साथ जी पाऊँगा।

    ये मेरे मन अक्सर खटकता सवाल हैं।

    पर हर बार कि तरह ये मेरा स्वार्थ है

    जो तुम्हारी भावनाओ का ख्याल कर नहीं पा रहा।

    पर सच बताऊ आखिरी में

    तुम्हारे बिना मेरा जीवन चल नहीं पा रहा।

  • बचपन के बाजार से

    बचपन के बाजार से

    उधर से, यादों के उस पार से

    खूशियां चूम के आया हूँ

    आज मैं बचपन के बाजार से

    घूम के आया हूँ।

    उस चाँदनी रात मे चाँद पे

    जाने के सपने देख रहा था।

    उन तारो पे जा लगे

    मैं वो पत्थर फेंक रहा था।

    उस आम के बगीचे से

    कुछ आम चुराये मैंने

    कुछ उसी समय पे खा लिए

    कुछ कल लिए छुपाए मैंने।

    और छाते हुये बादलो के नीचे

    मैं झूम के आया हूँ।

    आज मैं बचपन के बाज़ार से

    घूम के आया हूँ।

    यारो के साथ कतार मे

    मैं भी स्कूल गया था।

    कल क्या था या कल क्या होगा,

    मानो जैसे भूल गया था।

    हर एक रात नई थी जैसे

    हर एक दिन नया था।

    कू कू करके मैंने भी

    कोयलों को चिढ़ाया था।

    कोयल से याद आया

    कई गीतो को मैं भी तो

    झूम झूम के गाया हूँ।

    आज मैं बचपन के बाज़ार से

    घूम के आया हूँ।

    खूशिया उचाइयों पर थी हमारी

    हमारी उच्चि उड़ती पतंगो के साथ

    खूब उड़ाया हमने, आसमां सजाया मैंने।

    लो करली हमने उड़ते जहाजो से बात।

    गिल्ली डंडे के खेल मे गिल्ली के साथ

    खूशिया मैं उड़ाया हूँ

    छुपा छुपी मे उस टूटे मकान मे

    यादे छुपाकर आया हूँ।

    और चिक्का कबड्डी के खेल मे

    धरती माँ को चूम के आया हूँ।

    आज मैं बचपन के बाज़ार से

          घूम के आया हूँ।।

    आज मैं बचपन के बाज़ार से घूम के आया हूँ।

    सतीश ‘कौतूहल’

  • To Find Yourself -A Poem (In Hindi)

    To Find Yourself -A Poem (In Hindi)

    Dear readers,

              I am producing here before you some lines that are very close to my hearts. I wrote this poem almost 10 years ago.

              In today’s world, everybody is suggesting you to do this, do that, make progress in life, prove yourself blah, blah. This song, this poem goes contrary. A crow can’t be and shouldn’t be a beautiful peacock. A crow at best is a crow and it should know and enjoy its existence. (Most crows know, hah!). But we humans are very complicated. The biggest question for many people have been what they should do in their life. And by our parents and society we have not been taught to follow our hearts. We have been brought up being taught to do what is right things to do. But who decides that right thing to do.

              I am of the opinion, you may also be, that true happiness comes from doing thing that your heart desires. You have to know thyself. You have to find yourself. Going on path dictated by heart gives you the joy. Be fearless in following your passion. Read on to enjoy…

                      आना ही बेकार तेरा दुनिया मे

    आना ही बेकार तेरा दुनिया मे,

    जो अपने को तू पा ना सका।

    रोता रह गया अपने हार पर,

    दूसरों को तू हसा ना सका।

    भेड़ चाल मे क्यो लगा है?

    कहा जाना है तुझे पता ही नही।

    कहता है तू हार जाता है,

    और तेरी इसमे खता ही नही।

    क्यू करता है वो काम जिनहे,

    तुझको करना पड़ता है।

    बेचैन होके इन कामो से,

    अपने से तू झगड़ता है।

    अपने आप को खोज ले तू।

    अपना रास्ता खुद कर तय।

    अपने दिल से पूछ कर तू।

    पा ले अपने जीने का लय।

    मंजिल तेरे पास खड़ी है,

    उसको तू पहचान ले।

    उसके तरफ ही चलकर तुझे,

    खुशी मिलेगी जान ले।

    क्यू फिक्र करता है जमाने की,

    जमाना तेरा क्या करेगा?

    क्या उस दिन हसाएगा तुझे

    जिस दिन तू अंतिम साँसे भरेगा ?

    तू मुस्कुराएगा तभी अपनी ज़िंदगी पर
    जब तुमने अपने दिल से जिया है।

    जब पाया है तूने अपने को और

     दिल से ही सब काम किया है।

    साबित मत कर अपने को

    दिल के पथ पर आगे जा।

    खुद मुस्कुरा कर अपने पर तू

    जो तुझको पाना है पा।।

    • सतीश ‘कौतूहल’
  • Kautoohal (कौतूहल )

    For those interested in the meaning or those whose language is not Hindi, I will say, Kautoohal means excitement to know or experience something.

    Now, next question- Why this name to this blog? For quite a long time, I have been wondering about life. Have tried a lot of things just to know what life actually is. What is it that we actually want from life in the end? Why do we do any particular job or marry a particular persons? (Don’t conclude that it’s gonna be psychological website. Nah!)

    But, then we see the child, who is happy. Almost all the time. What is most common about almost every child is this, Kautoohal. This is it that keeps a child lively. Alive!

    Ever seen some most interesting persons. You would notice instantly, this quality in them.

    Finally, I will say, Kautoohal is not only a quality, it’s an state of being, it’s a form of energy, it’s a force that has driven the humankind to discover and invent remarkable things. So, this, my blog is a place of different ideas on different subjects. From Earth to mars, from love to spirituality, from poems to novels, From random to unimagined ideas and so on.